नोटबंदी : चौकन्‍नी है मोदी की टीम, वहां पहुंची नजर, जिससे सब थे बेखबर, ऐसे उड़ाई दिग्‍गजों की नींद..!

भारत के राजनीतिक इतिहास में नोटबंदी का फैसला ऐतिहासिक बन गया है। एक झटके में 86 फीसदी 500 और 1000 रुपये के नोटों को एकाएक बंद करना मजबूत राजनीतिक इच्‍छाशक्‍ति को बताता है। इस फैसले को अब पूरा एक महीना हो चुका है और बीते एक महीने में दुनिया के भर की रेटिंग एजेंसी से लेकर नौबेल लॉरेट्स अमर्त्‍यसेन और दिग्‍गज अर्थशास्‍त्री व पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तक इस पर प्रतिक्रिया दे चुके हैं।

इधर, दिग्‍गज कॉर्पोरेट्स और बिजनेस हाऊस भी सरकार के इस फैसले का विश्‍लेषण कर रहे हैं, जबकि मीडिया में 24 घंटे इसी पर चर्चा है। भारत के सुदूर गांवों, कस्‍बों में पान की गुमठियों के अलावा गृहणियों की मीटिंग्स तक में नोटबंदी के निर्णय की चीर-फाड़ हो रही है। कुल मिलाकर नोटबंदी के परिणामों को लेकर अच्‍छी और बुरी प्रतिक्रियाएं दोनों ओर से आ रही हैं, लेकिन अब तक असल बात समझ नहीं आ पाई है कि छह से 8 माह बाद नोटबंदी का वास्‍तविक असर देश के आर्थिक और सामाजिक ढांचे पर कैसा होगा?

दरअसल, एक ओर बड़ा वर्ग प्रधानमंत्री के साहसिक फैसले के खिलाफ खड़ा हो गया है। फैसले के विरोध में बोलने वालों में कुछ ऐसे भी हैं, जो सीमित सोच और सूचना के अभाव में नाहक ही भीड़ में अलग बनने की चाह में फैसले के खिलाफ खड़े हो गए हैं। हालांकि ऐसा नहीं है कि उन्‍हें विरोध करने का अधिकार नहीं है, या उन्‍हें ये अधिकार नहीं दिया जाना चाहिए, बल्‍कि ये तो उनका लोकतांत्रिक अधिकार है, फिर विरोध चाहे छोटा हो या बड़ा। लेकिन ऐसा भी देखने में आ रहा है कि कुछ लोग विरोधी बन कर ही ध्यानाकर्षण करना पसंद करते हैं, गोया कि विरोध ही उनके ज्ञान का आधार है।

बहरहाल, भारत सरकार की विमुद्रीकरण की नीति के विरोध और पक्ष की जंग में मेरी खुशी का ठिकाना तब नहीं रहा, जब ऑनलाइन होस्टिंग से जुड़ी अमेरिकन और कई विदेशी कंपनियों ने दिसंबर की अपनी बिलिंग में 15 प्रतिशत सर्विस टैक्स का हवाला देकर अपने भारतीय ग्राहकों को इसे जमा करवाने को कहा। आपको बता दूं कि अभी पिछले महीने ही प्रधानमंत्री के कुछ सिपहसालारों ने उन्हें इस चोरी के बारे में बताया था, और सुनते ही माननीय प्रधानमंत्री जी ने एक टीम बनाकर इसे रोकने को कहा।

इसी क्रम में फाइनेंस मिनिस्ट्री से जुड़े कुछ बेहतरीन लोगों ने रात-दिन एक कर 9 नवंबर 2016 को एक सर्कुलर जारी कर दिया। यह Circular No. 202/12/2016-Service Tax था। सीबीईसी यानी सेंट्रल बोर्ड ऑफ एक्साइज एंड कस्टम की ओर से 9 नवंबर को जारी किए गए इस सर्कुलर की सबसे बड़ी बात ये रही कि पूर्ववर्ती सरकारों  को अब तक यही मुगालता था कि सर्विस टैक्स सिर्फ सर्विस देने वाले से और उसकी टेरिटरी अगर इंडिया हो तो ही लिया जा सकता है, यही नहीं अधिकारी वर्ग भी यही मानता रहा कि इन सबसे और ज्यादा तेल नहीं निकाला जा सकता है, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी जी की टीम की नजर पहले से ही इन पर थी और उन्‍होंने एक ही फैसले में सरकारी खजाने को भरने का एक और रास्‍ता खोल दिया। दरअसल, उन्होंने तुरंत एक सर्कुलर से संशोधन पर अपनी स्वीकृति दे दी, जिसमें कहा गया कि सर्विस लेने वाला यदि भारत का है, तो भी सर्विस देने वाले को 15 प्रतिशत टैक्स देना होगा। फैसले का सीधा असर ऑनलाइन स्पेस, गेम, एंटरटेनमेंट और वेब से जुड़ी कंपनियों को होने वाला था, जो अब तक करोड़ों कमा रहीं थीं, वो भी बिना टैक्स दिए,लेकिन सरकार के समझ-बूझ भरे फैसले ने पूरी बाजी ही पलट दी।

यकीनन, ये सरकार की वो निगाहें हैं, जो वहां पहुंच रही है, जिसकी किसी को खबर तक नहीं है। ऐसा लगता है, मानों पीएम मोदी की दसों  दिशाओं में नजर दौड़ रही है। मुझे नहीं पता कि उनकी टीम ये सब कैसे कर रही है, लेकिन गांवों में नोटबंदी का असर देखने के लिए 82 अधिकारियों की टीम का कई राज्‍यों के ग्रामीण इलाकों में पहुंचकर पूरी सूचना पीएमओ को दे देना, आयकर विभाग के देश भर में लगातार पड़ रहे छापे जैसे तेजी से लिए जा रहे फैसले चौंकाते हैं। ये निर्णय ये बताते हैं कि लोकतांत्रिक संस्‍थाओं से काम कैसे करवाया जाना चाहिए। इतनी मुस्‍तैदी बीते 60 सालों में नहीं दिखाई दी।

बहरहाल, ऑनलाइन इंटरनेट कंपनियों के बाजार में इस सर्विस टैक्‍स चोरी की ही बात करें, तो अब भी इंटरनेशनल ऑनलाइन बाजार और भारतीय सेवा प्रदाता जुगाड़ का इस्तेमाल कर भारतीय राजस्व को अपनी जेबों में डाल रहे हैं, पर जिस तरीके से छोटी-छोटी बातों पर सरकार का ध्यान जा रहा है,  निश्चित ही भारतीय राजस्व के बढ़ने की उम्मीद आप और हम कर सकते है। आपको यहां यह भी बताता चलूं कि अब भी कई विदेशी सेवाओ जैसे AWS,Steam और Name cheap जैसी सैकड़ों सेवाओं से भारत सरकार अब तक कोई टैक्स वसूल नहीं कर पाई है।

खैर..! फिलहाल सबसे पहले अमेरिकन होस्टिंग सर्विस प्रोवाइडर कंपनी ‘डिजिटल ओसियन’  ने सर्विस टैक्स का हवाला देते हुए अपने भारतीय ग्राहकों को 1 दिसम्बर की बिलिंग में 15 प्रतिशत सर्विस टैक्स का ब्यौरा दिया है। हालांकि अभी ‘डिजिटल ओसियन’ कंपनी खुद अपनी तरफ से भारतीय ग्राहकों को टैक्स अमाउंट क्रेडिट कर रही है, ताकि भारतीय ग्राहकों को फिलहाल अतिरिक्त पैसा देना न पड़े। हालांकि गूगल और अमेज़न ने अपने पत्ते नहीं खोले है, लेकिन जिस तरह से सरकार काम कर रही है, यकीनन, बकरे की मां कब तक खैर मनाएगी।

आपको बता दें कि 9  नवंबर के सीबीईसी के सर्कुलर के मुताबिक भारत में सेवाएं देने वाली तमाम विदेशी कंपनियों को सरकार को 1 दिसंबर से 15 फीसदी सर्विस टैक्स देना होगा और भारतीय कानून के तहत पंजीकरण कराना होगा। यही नहीं विदेशी सर्विस प्रोवाइडर से डाटा स्टोरेज स्पेस लेने पर भी टैक्स लगेगा। ये टैक्स केवल पेड सर्विस पर ही लगेगा, मुफ्त कंटेंट पर नहीं। इस नोटीफिकेशन के लागू होने के बाद पेड गाने, फिल्में डाउनलोड करना, सॉफ्टवेयर खरीदना, इंटरनेट कॉलिंग करना, पेड गेम्स खरीदना और डाटा स्टोरेज स्पेस खरीदना महंगा होने वाला है।

 

 

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