नोटबंदी : सवालों में पीएम मोदी का ये बड़ा वादा, अब आठ से दस महीने के लिए आ सकती है ये नई मुश्‍किल?

नोटबंदी पर प्रधानमंत्री ने खुद जनता से 50 दिन की मोहलत मांगी है, और वादा किया है कि 50 दिन के अंदर,  यानी की 30 दिसंबर तक जनता को नकदी से हो रही परेशानी से निजात मिल जाएगी। लेकिन पीएम मोदी का ये बड़ा वादा अब सवालों के घेरे में है, क्‍योंकि नोटबंदी को एक माह होने के करीब है, लेकिन समस्‍या ना तो कम हुई है और ना ही कम होती दिखाई दे रही है।

दरअसल, अर्थव्‍यवस्‍था में अचानक नोटबंदी से पैदा हुई नकदी की ये किल्‍लत लंबे समय तक बनी रहेगी और यदि आरबीआई दिन-रात भी नोट छापे, तो भी अर्थतंत्र में करेंसी की कमी पूरी होने में छह से आठ महीने लग सकते हैं। जानकारों का मानना है कि ऐसी स्‍थिति में भवन-निर्माण, कृषि समेत इनसे जुड़े काम-धंधे और व्यापार-व्यवसाय बैठ जाएंगे और खास तौर पर असंगठित क्षेत्रो में काम कर रहे मजदूर रोजी-रोटी से हाथ धो बैठेंगे। ये ही लोग काम की तलाश में गांव ले शहर आते हैं, लेकिन नकदी के अभाव में न तो इनके पास गांवों में काम होगा, न ही शहरों में इन्हें पनाह मिलेगी।

अर्थशास्‍त्री जया मेहता नोटबंदी की वैधता, गोपनीयता, सरकार द्वारा इस संकट के निपटने के बारे में किए जा रहे दावों पर सवाल उठाते हुए कहती हैं- नोटों की कमी पूर्ति में 8-10 महीने लग सकते हैं, क्‍योंकि देश में नोट छापने के कारखानों की क्षमता 2200 करोड़ नोट, प्रतिवर्ष छापने की है, जबकि नोटबंदी के कारण 2300 करोड़ नोट बैंकों में वापस आए हैं। प्रेस में नोटों की साल भर भी छपाई हो और यह मान कर चला जाए कि इस बीच छोटे नोट, यानी की 100, 50, 20 और 10 के नोट नहीं छपेंगे या कम छपेंगे तो भी बाजार में पूरे नोट वापस आने में 6 से 8 महीने लगेंगे। वे बताती है कि नोटबंदी के इस फैसले से सबसे ज्‍यादा असर मजदूरों पर हो रहा है और उनकी रोजी-रोटी के लाले पड़ रहे हैं।

सामाजिक और आर्थिक मसलों पर अनुसंधान करने वाली जोशी अधिकारी पीठ (दिल्ली) की प्रमुख जया मेहता के मुताबिक नोटबंदी से उबरने के लिए देश को छह से आठ महीने लग जाएंगे, क्‍योंकि इस लंबी अवधि तक बाजार में नकदी का संकट बना रहेगा, इसका सबसे बुरा असर भवन निर्माण क्षेत्र पर पड़ेगा। वे बताती हैं कि भवन-निर्माण, यानी कि कंस्ट्रक्शन में कुल 4 करोड़ मजदूरों को काम मिलता है। इसमें संगठित क्षेत्र में 1.4 करोड़ मजदूर और असंगठित क्षेत्र में 3 करोड़ मजदूर हैं, और मुद्रा की कमी से ये लोग अपने रोजगार से हाथ धो बैठेंगे और इनसे संबंधित अन्य उद्योग, व्यापार, व्यवसाय भी प्रभावित होने लगेंगे।

वे कहती हैं कि इसके असर की खबरें भी आने लगी हैं, और सीमेंट और निर्माण कंपनी लार्सन एंड टरबो ने 14 हजार लोगों को हटा दिया है। इधर, भीलवाड़ा से लेकर दिल्ली की औद्योगिक इकाइयों में उत्पादन आधा रह गया है, जिसके कारण मजदूर को काम से हटाया जा रहा है। गुजरात में मोरबी टाइल्स, मेरठ का कैंची उद्योग, लुधियाना का साइकिल कारोबार, आगरा का चमड़े के जूते बनाने का कारोबार नोटबंदी की जद में आ चुका है और इनसे जुड़े लाखों लोग घर बैठ गए हैं।

जया कहती है कि नोटबंदी का असर यहीं तक सीमित नहीं है, बल्‍कि इसकी मार अब हमारी कृषि पर भी पड़ने वाली है, क्‍योंकि अभी खरीफ की बिक्री और रबी की बुवाई का समय है। किसानों को मुद्रा चाहिए, लेकिन पहले तो नोटबंदी के नाम पर किसानों की सारी मुद्रा उनके बैंकों में रखवा ली और अब यह नियम लगा दिया है कि पुराने पांच और हजार के नोट से कॉपरेटिव से बीज खरीद सकेंगे, लेकिन अब किसानों के पास मुद्रा ही नहीं है, तो वे कहां से बीज खरीदेंगे।

बता दें कि कृषि क्षेत्र में 10 करोड़ मजदूर हैं, और खेतिहर गांव से शहर भी आते हैं, लेकिन शहरों में काम नहीं मिलेगा तो इन्हें वापस गांव जाना पड़ रहा है। गौर करने वाली बात यह है कि इन मजदूरों की आवाज और इनके दुख-तकलीफों की बात न तो कोई मीडिया न सोशल मीडिया और न ही कोई अखबार करता है। यह पता भी नहीं चलेगा कि ये मजदूरों की पूरी जमात और उनके दुख, तकलीफ कहां गुम हो जाएंगे।

जया मेहता ने नोटबंदी के निर्णय की वैधता को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट की वकील इंदिरा जयसिंह के हवाले से कहा कि रिजर्व बैंक की धारा 26 (2) में यह प्रावधान है कि आप नोटबंदी में कोई खास सीरीज को बंद कर सकते हैं, लेकिन पूरी की पूरी सीरीज को बंद नहीं कर सकते हैं, लेकिन सरकार ने पांच सौ और हजार के नोटों की पूरी की पूरी सीरीज ही बंद कर दी, जो कि गलत है। वे कहती हैं कि हालांकि ऐसा नहीं है कि इसके पहले नोटबंदी नहीं हुई बल्‍कि पहले जब दो बार नोटबंदी हुई तो ब्रिटिश सरकार ने और फिर पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने अध्यादेश का सहारा लिया था, लेकिन इस बार इस फैसले के लिए अध्यादेश का सहारा क्यों नहीं लिया गया? इस तरह एक बड़े फैसले को लेने में संसद की उपेक्षा की गई।

वे कहती हैं कि आश्‍चर्य है कि किस आधार पर यह कहा जा रहा है कि यह फैसला गोपनीय था। नोटबंदी का फैसला कतई गोपनीय नहीं था। यह फैसला रिजर्व बैंक बोर्ड के डायरेक्टर करते हैं, जिन्हें एक महीने पहले इसकी सूचना देनी पड़ती है और बैठक का एजेंडा बताना पड़ता है। रिजर्व बैंक के बोर्ड़ में तीन डायरेक्टर निजी कंपनियों से जुड़े हैं और इन्हें नियमानुसार नोटबंदी के एजेंडा की जानकारी एक महीने पहले दे गई होगी। अब सरकार द्वारा इस मामले को गोपनीय रखने की बात गले से उतरती नहीं है। वे कहती हैं कि आरबीआई के डायरेक्टर डॉ. नचिकेता आईसीआईसीआई बैंक से जुड़े रहे हैं, डॉ. नटराजन टीसीएस टाटा कंसल्टेंसी सर्विस के एमडी और सीईओ रह चुके हैं। यही नहीं भरत नरोत्तम दोषी महिंद्रा एंड महिंद्रा लि, के सीईओ रह चुके हैं और वे भी गोदरेज से जुड़े रहे हैं, लिहाजा सरकार की गोपनीयता वाली बात भी सवालों के घेरे में है।

वे कहती हैं कि दरअसल, रिजर्व बैंक के नियमों के तहत मौद्रिक नीति संबंधी किसी भी निर्णय का फैसला रिजर्व बैंक का बोर्ड़ करता है और फिर केंद्र सरकार से इसे लागू करने के लिए कहता है। इस बोर्ड में कॉर्पोरेट से जुड़ी निजी कंपनियों के तीन डायरेक्टर थे, ऐसे में सरकार का यह दावा करना कि इस निर्णय को पूरी तरह से गोपनीय रखा गया, संदेह पैदा करता है।

जया कहती हैं कि 8 नवंबर को नोटबंदी की घोषणा के बाद से ही सरकार रोज ही नई अधिसूचना ला रही है, अब तक 10 अधिसूचनाएं आ चुकी हैं। सरकार ये नए नियम अपनी विवेक के आधार पर कर रही है, जो यह कहता है कि पुराने नोट विमान में बैठने वालों को चलते रहेंगे, पेट्रोल पंपों पर चलते रहेंगे, लेकिन कॉपरेटिव बैंक में नहीं चलेंगे।

गौर करने वाली बात है कि सरकार यह कैसे तय कर रही है कि पुराने नोटों से विमान में यात्रा करने करने की छूट रहेगी, लेकिन कॉपरेटिव में इन नोटों को बदलने की छूट नहीं रहेगी। यह सब जानते हैं कि विमान में कौन सा वर्ग बैठता है और कॉपरेटिव बैंक में गरीब और किसान वर्ग के लोग निर्भर रहते हैं, इसी तरह से अब एक बड़े मॉल को भी डेबिट कार्ड के जरिए दो हजार रुपए निकालने की छूट दे दी गई है, तो इस मॉल को ही चुनने के पीछे सरकार पर सवाल उठते हैं।

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